किर्गिस्तान में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक सुरक्षा और बढ़ते संघर्षों के बीच भारत की प्राथमिकताओं को बेहद स्पष्ट तरीके से सामने रखा। प्रधानमंत्री ने कहा कि युद्ध के मैदान में किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं मिलता। उन्होंने सभी युद्धों और विवादों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने की जरूरत बताई। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, जबकि यूक्रेन संघर्ष भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
लेकिन SCO मंच पर प्रधानमंत्री मोदी का संदेश केवल शांति और कूटनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की जोरदार वकालत की और कहा कि इस मुद्दे पर किसी भी तरह का दोहरा रवैया नहीं होना चाहिए। खास बात यह थी कि उनका यह बयान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में आया।
युद्धों के बीच भारत की कूटनीतिक लाइन साफ
प्रधानमंत्री मोदी ने SCO के मंच से कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देना जरूरी है। भारत का यह रुख पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सामने आता रहा है, लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात में इस संदेश की अहमियत और बढ़ गई है।
मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष ने कई देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा की चिंता बढ़ाई है। तेल और गैस की आपूर्ति से जुड़े मार्गों पर तनाव का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप से लेकर एशिया तक सुरक्षा और आर्थिक समीकरणों को प्रभावित किया है। ऐसे समय में भारत का जोर सैन्य टकराव के बजाय राजनीतिक समाधान पर है।
मोदी का संदेश मूल रूप से यही था कि किसी भी संघर्ष को लंबा खींचने से नुकसान बढ़ता है और अंततः समाधान के लिए बातचीत की मेज पर ही लौटना पड़ता है।
आतंकवाद पर PM मोदी का कड़ा संदेश
SCO में प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद को लेकर भारत की सबसे अहम सुरक्षा चिंताओं को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ सभी देशों को एक आवाज में खड़ा होना होगा और इस मामले में दोहरे मानदंडों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने आतंकवाद को केवल हमले तक सीमित समस्या न मानते हुए उसके पूरे नेटवर्क को खत्म करने की जरूरत बताई। इसमें आतंकवाद के लिए होने वाली फंडिंग, युवाओं की भर्ती, कट्टरपंथ और आतंकियों को मिलने वाले सुरक्षित ठिकाने शामिल हैं।
प्रधानमंत्री के इस बयान को पाकिस्तान के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके संबोधन के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी उसी मंच पर मौजूद थे। ऐसे में आतंकवाद पर मोदी की टिप्पणी ने SCO सम्मेलन के राजनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया।
CPEC को लेकर भारत ने फिर स्पष्ट किया रुख
प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में सहयोग का समर्थन किया, लेकिन इसके साथ भारत की पुरानी आपत्ति भी दोहराई। उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाओं में दूसरे देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए।
इस टिप्पणी को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC से जोड़कर देखा जा रहा है। CPEC चीन के शिनजियांग क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने वाली करीब 3,000 किलोमीटर लंबी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की श्रृंखला है। इसका एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरता है, जिस पर भारत लगातार अपनी आपत्ति दर्ज कराता रहा है।
इसलिए SCO जैसे मंच पर कनेक्टिविटी के साथ संप्रभुता का मुद्दा उठाना भारत की रणनीतिक स्थिति को दोहराने जैसा है।
SCO में भारत के सामने कई अहम मुद्दे
SCO की शुरुआत 2001 में चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद ईरान 2023 में और बेलारूस 2024 में संगठन में शामिल हुए। वर्तमान में SCO के 10 सदस्य देश हैं।
इस बार सम्मेलन का विस्तार SCO-Plus प्रारूप में किया गया है। इसमें संगठन के सदस्य देशों के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी शामिल हुए हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन, अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान समेत कई नेताओं की मौजूदगी ने सम्मेलन का दायरा बढ़ाया है।
ऐसे बड़े मंच पर भारत के लिए सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और आपसी सहयोग भी महत्वपूर्ण विषय हैं।
चीन और पाकिस्तान की मौजूदगी में भारत का संदेश
SCO सम्मेलन की एक खास बात यह रही कि भारत की बात ऐसे मंच पर रखी गई जहां चीन और पाकिस्तान दोनों मौजूद थे। चीन के साथ भारत के सीमा और रणनीतिक मुद्दे हैं, जबकि पाकिस्तान के साथ आतंकवाद और सीमा सुरक्षा से जुड़े गंभीर मतभेद हैं।
इसके बावजूद भारत ने बहुपक्षीय मंच पर अपनी बात सीधे और स्पष्ट तरीके से रखी। एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने युद्धों के समाधान के लिए बातचीत की जरूरत बताई, वहीं दूसरी तरफ आतंकवाद के खिलाफ किसी समझौते की गुंजाइश नहीं होने का संदेश दिया।
यह भारत की उस कूटनीतिक रणनीति को दिखाता है जिसमें संवाद के रास्ते खुले रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कठोर रुख कायम रखा जाता है।
दुनिया को भारत का दोहरा संदेश
SCO Summit में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन को दो प्रमुख संदेशों में समझा जा सकता है। पहला—युद्ध किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं है, इसलिए बातचीत और कूटनीति का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। दूसरा—आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में किसी देश के लिए अलग नियम नहीं हो सकते।
मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच भारत ने एक साथ शांति और सुरक्षा दोनों मुद्दों को सामने रखा है। प्रधानमंत्री मोदी का बयान यह संकेत देता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय विवादों के राजनीतिक समाधान का समर्थन करता है, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के मामले में किसी भी तरह की नरमी को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है।
कुल मिलाकर, SCO Summit में भारत ने अपनी प्राथमिकताएं साफ कर दी हैं—संघर्षों का समाधान बातचीत से, आतंकवाद के खिलाफ एकजुट कार्रवाई और क्षेत्रीय परियोजनाओं में संप्रभुता का सम्मान। यही संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंच से दिया, जहां एशिया और दुनिया की कई बड़ी ताकतें एक साथ मौजूद थीं।
