इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में कहा है कि बहू अपने सास-ससुर को गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। यह इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला परिवारिक कानून से जुड़े मामलों में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने अपने आदेश में साफ कहा कि भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत गुजारा भत्ता का अधिकार केवल उन्हीं लोगों को मिलता है जिनका कानून में स्पष्ट उल्लेख है।
बहू सास-ससुर गुजारा भत्ता मामले पर कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने कहा कि बहू सास-ससुर गुजारा भत्ता मामला कानून के दायरे में नहीं आता, क्योंकि सास-ससुर को इस धारा के तहत लाभार्थी के रूप में शामिल नहीं किया गया है। इसलिए बहू को उनके भरण-पोषण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ता का अधिकार एक सांविधिक अधिकार है और इसे केवल उन्हीं लोगों तक सीमित रखा जा सकता है जिनका उल्लेख कानून में किया गया है।
भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता धारा 144 पर बड़ी टिप्पणी
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता धारा 144 का गलत अर्थ निकालकर किसी भी रिश्ते पर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून केवल सीमित वर्ग के लोगों के लिए बनाया गया है।
यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, जहां सास-ससुर अपनी बहू से गुजारा भत्ता की मांग करते हैं।
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